शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

मूक की आवाज़


मूक की आवाज़
मेरे मोहल्‍ले में एक कुत्‍ता रहता है
उसे मैं कभी कुछ खिला देती हुँ
मुझे देखकर वह पूँछ हिला दिया करता है
बस एक बार उसकी भुँकने पर ध्‍यान गया मेरा
बडी अच्‍म्‍बे में पड गई मैं कि
हरेक बार उसकी आवाज अलग थी
मोहल्‍ले वालों को देखकर अपनापन की
बच्‍चों को देखकर उत्‍साह की
अनजानों को देखकर सवाल की
और अनचाहों को देखकर गुस्‍से की
राज के सन्‍नाटे में दूर से
अपने हमजात को सुनकर
कभी खुशी की
कभी अकेलेपन की
कभी प्‍यार जताने की
कभी रोब जमाने की
कभी निष्‍ठूर काल की आशंका के डर की
कितने कितने भाव भरे हुए
कितनी कितनी आवाज़े निकलती हैं
इस मूक प्राणी के मुँह से
शायद ही मैं बयान कर पाऊँ
उन सभी भावों को शब्‍दों से ।।

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