मूक की आवाज़ मेरे मोहल्ले में एक कुत्ता रहता है उसे मैं कभी कुछ खिला देती हुँ मुझे देखकर वह पूँछ हिला दिया करता है बस एक बार उसकी भुँकने पर ध्यान गया मेरा बडी अच्म्बे में पड गई मैं कि हरेक बार उसकी आवाज अलग थी मोहल्ले वालों को देखकर अपनापन की बच्चों को देखकर उत्साह की अनजानों को देखकर सवाल की और अनचाहों को देखकर गुस्से की राज के सन्नाटे में दूर से अपने हमजात को सुनकर कभी खुशी की कभी अकेलेपन की कभी प्यार जताने की कभी रोब जमाने की कभी निष्ठूर काल की आशंका के डर की कितने कितने भाव भरे हुए कितनी कितनी आवाज़े निकलती हैं इस मूक प्राणी के मुँह से शायद ही मैं बयान कर पाऊँ उन सभी भावों को शब्दों से ।। |
तरुणी कविताऍं पन्ने पर आपका सुस्वागतम् । तरुणी शीर्षक इसलिए चुना गया कि लेखन कला में लिखनेवाला तरुण है और आप पाऍंगे कि कविताऍं भी तरुण हैं । इन कविताओं में कोई नई बात शायद नहीं होगी । संसार के हर जीव के जीवन में इधर-उधर देखी-सुनी एवं अनुभवित बातों का ही शब्दरूप देने की कोशिश है ये कविताऍं । हमें खुशी होगी कि आप इनको पढकर अपनी टिप्पणी लिख भेजें ।
शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012
मूक की आवाज़
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें