गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

किताब का दुख




किताब का दुख
हवा खा रही है अधखुली किताब

आधा पढकर कोई छोड गया उसे

शायद वह समझ न पाया उसे

शायद वह नीरस लगी उसे

पडी पडी किताब सोच रही है
क्‍या वह पिफर मुझे लेगा हाथ में
?

कभी पलटेगा मेरे पन्‍ने ?

कभी जानने का प्रयत्‍न करेगा मुझे ?

या रख देगा मुझे सजाकर?

या फेंक देगा मुझे उठाकर किसी कोने में?

या दे देगा किसी और के हाथ?

भरोसा नहीं इसका !!

मानव इतना चंचल क्‍यों है ?

इतना अविश्‍वासी क्‍यों है ?

इतनी जल्‍दी हाथ क्‍यों छुडा लेता है?

इतना शीघ्र मन क्‍यों हार देता है?

अपने पंचेन्द्रियों क्‍यो खुला, पर

ज्ञानेन्‍द्रियों को बंद रखता है क्‍यों ?

किसी मानव ने ही तो रचा है मुझे

मानव मानव को न समझे तो

औरों को क्‍या समझेगा!

अफसोस है कि

बस दो पन्‍ने और पढ लेता वो

तो समझ पाता मुझे, पी लेता मेरा रस

हे मानव। अपनी मन की ऑंखें खोले रखो

अपने मन के कान खोले रखो

तब मानव ही के क्‍या

पेड पौधों के, पशु पक्षियों के

जल, थल, नभ के लेख भी पढ पाओगे

उनकी मौन निमंत्रण सुन पाओगे

प्रकृति का संदेश आत्‍मसात कर पाओगे ।।

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