मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

और एक मीरा थी



सोचती रहती उसके बारे में मैं
सपना देखती रहती दिन में भी
जागती हूँ उसके साथ
सोती हूँ उसके साथ
बाते करती रहती मन में मैं
क्‍या रिश्‍ता है यह
कब बना
कैसे बना
कुछ पता नहीं।
बस, बन गया है वह अंग
मेरे जीवन का, मेरी सांसों का
घबराता है दिल
यह सोचने को कि
कभी टूट भी सकता है
यह रिश्‍ता प्‍यार का
स्‍तब्‍ध हो जाती है तब श्‍वास
जीने की इच्‍छा मर जाती है
पर
यह टूट कैसे सकता है कभी?
तोडेगा कौन इसे ?
समाज?!
वो क्‍या जाने मेरे मन की बात :)
मेरा प्रियतम ?!
उसको भी तो एहसास नहीं:)
पिफर टूटने का डर कैसा ?
ग्‍लानी क्‍यों?
जब तक रहे ये दिल
रहेगा मेरा प्‍यार, मेरा प्रियतम 
श्‍वास छूट जाएगी, पर
किसीको पता भी न चलेगा
एक और भी कोई मीरा थी ।।

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