सोचती रहती उसके बारे में मैं
सपना देखती रहती दिन में भीजागती हूँ उसके साथ
सोती हूँ उसके साथ
बाते करती रहती मन में मैं
क्या रिश्ता है यह
कब बना
कैसे बना
कुछ पता नहीं।
बस, बन गया है वह अंग
मेरे जीवन का, मेरी सांसों का
घबराता है दिल
यह सोचने को कि
कभी टूट भी सकता है
यह रिश्ता प्यार का
स्तब्ध हो जाती है तब श्वास
जीने की इच्छा मर जाती है
पर
यह टूट कैसे सकता है कभी?
तोडेगा कौन इसे ?
समाज?!
वो क्या जाने मेरे मन की बात :)
मेरा प्रियतम ?!
उसको भी तो एहसास नहीं:)
पिफर टूटने का डर कैसा ?
ग्लानी क्यों?
जब तक रहे ये दिल
रहेगा मेरा प्यार, मेरा प्रियतम
श्वास छूट जाएगी, पर
किसीको पता भी न चलेगा
एक और भी कोई मीरा थी ।।

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