शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

दिल तो बच्चा है जी ।।


दिल है कि मानता नहीं

अपने को संभालता नहीं

पिरता रहे कभी इधर

कभी उधर

ढोलता रहे कभी इस ओर

कभी उस ओर

कौन समझाए इसको कि

इसके पिरने-ढुलने से

न कुछ होगा

न बदले जीवन की रफतार

न ही जीवन की दिशा

न बदले चॉंद व सूरज

न ही दिल और रात

मानता कब है ये दिल

अपने में खोया रहता है

अपनी बात दोहराता रहता है

कभी बच्‍चे की तरह जिद करता है

कभी बडे की तरह रोब जमाता है

मनाते न मानता है

समझाते न समझता है ।

बस एक तरीका है

इसे काबू में रखने का ---

अनसुना किया करो इसकी बातें

अनदेखा किया करो इसकी करतूतें

अनछुआ रहा करो इससे

आ जाएगा वह बस में

आखिर

दिल तो बच्‍चा है जी ।।

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