मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

मेरी चाह!


चाह नहीं मैं पंछी बन जाऊँ

गगन में उड़कर चाँद छू आऊँ

चाह नहीं मैं मीन बन जाऊँ

सागर में डूबकर पाताल हो आऊँ

चाह है मगर मैं ऐसा कुछ बनूँ

मानव के मन में घुसकर

उसका रहस्य मैं जान जाऊँ

क्या है उसके मन में ? कि

मानव होता है इतना स्वार्थी

होता है इतना अहंकारी

होता है इतना अभिमानी

क्या है उसके मन में कि

वह अपने भाई से भी लड़-भिडता है

नालों में खून की धारा बहाता है

मानव-मानव में भेद कर पाता है

और अपने को ऊँचा दिखाना चाहता है

क्या है उसके मन में कि

धन-दौलत के लिए मर मिठता है

शानो शौकत पर दिल निछावर करता है

सच के नाम पर झूठ कहता है

न्याय के नाम पर अन्याय दिलाता है

धर्म के नाम पर अधर्म फैलाता है

क्या है उसके मन में ?

वैज्ञानिक बना चुके यंत्र जो

सागर, पृथ्वी आकाश को

चीरकर उनके रहस्य निकाल लाएँ

अणु तोडकर ऊर्जा बहा लाएँ

पर बना सके यंत्र जो

मानव मन का रहस्य बताएँ

इसलिए

चाह है कि ऐसा कुछ बन जाऊँ

कि मानव मन का रहस्य जान जाऊँ  ।।

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