हे मन ! तेरा क्या भरोसा ?
कभी इधर, कभी उधर
भटकती रहती तेरी नज़र ।
अमृत हाथ में है तेरे, पर
विष की प्याली ललचाती तुझे !
आनंद है द्वार पर तेरे, पर
विषय दुख का राज है तुझपर !
पर राज्य भी पा सकते हो तुम, पर
विषम सुख से भटकाये हुए हो ।
ईश की करूणा है तुझपर, पर
वेषाडंबर पर ध्यान है तेरी ।
उत्तम भविष्य है राह पर तेरे
सुस्ती से उसे ठुकराया तुमने ।
ऊर्ध्व नृत्य भी देख सकते हो शिव की
एकाग्र करो जब अपना ध्यान उसपर ।
हे मेरे मन! अब माया की डोर काटो
मुक्त हो जाओ माया मोह से
मग्न हो जाओ उस असीम ज्ञान में
मिल जाएगा तुम्हें जन्म जन्म से उद्धार ।।

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