मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

हे मन !


हे मन ! तेरा क्या भरोसा ?

कभी इधर, कभी उधर

भटकती रहती तेरी नज़र ।

अमृत हाथ में है तेरे, पर

विष की प्याली ललचाती तुझे !

आनंद है द्वार पर तेरे, पर

विषय दुख का राज है तुझपर !

पर राज्य भी पा सकते हो तुम, पर

विषम सुख से भटकाये हुए हो ।

ईश की करूणा है तुझपर, पर

वेषाडंबर पर ध्यान है तेरी ।

उत्तम भविष्य है राह पर तेरे

सुस्ती से उसे ठुकराया तुमने ।

ऊर्ध्व नृत्य भी देख सकते हो शिव की

एकाग्र करो जब अपना ध्यान उसपर ।

हे मेरे मन! अब माया की डोर काटो

मुक्त हो जाओ माया मोह से

मग्न हो जाओ उस असीम ज्ञान में
मिल जाएगा तुम्हें जन्म जन्म से उद्धार ।।

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