पतझड में गिरते लाखों-हजारों पत्ते पेड से
पर रोते नहीं हैं पेड, न ही गिरते पत्ते !
पता है उनको कि ये नियम है पावन प्रकृति का ।
इसे तोडना या मोडना उनके बस में है नहीं
मानव है कि समझता अपने को सर्वशक्तिमान
लेकिन समझ पाता नहीं ये प्रकृति के विधान
इसलिए तोडता है, मोडता है उसके नियम
जिसका फल भोगना पड़ता है, केवल उसको नहीं
बल्कि प्रकृति के हरेक जीव-जंतु को ।
इतना तक कि मानव की भावी पीढियों को भी ।
यह जानते हुए भी
वह रोक नहीं पाता है अपने को
क्योंकि
स्वार्थ ने बना दिया है उसे अंधा
गर्व ने बना दिया हे उसे क्रूर
लोभ ने बना दिया है उसे बेबस
हे मानव! अब तो जाग उठो !
अपना अंधापन,
अपनी बेबसी और
अपने क्रूरता के पर्दे फाडो
देखो दुनिया को मानव बनकर
करो दुनिया के लिए कुछ अच्छे काम
ताकि दुनिया में रहे तेरा नाम हर धाम ।।

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